अनहोनी

कुर्सियाँ ख़ाली पड़ी हैं
टेबुलें उदास
दीवालें मौन
और दरवाज़े ताक रहे हैं सूना आकाश
अहाते में लहूलुहान पड़ी है
राष्ट्रपिता की लाश….
संसद भवन में छाया है सन्नाटा

स्वागत है नववर्ष का

स्वागत है नववर्ष,
काश कुछ ऐसा हो इस वर्ष!
किसी बस्ती पे न गिरे बम,
सुख-दुख में मिलके रहें हम,
ओसामा हो या सद्दाम,
ब्लेयर हो या बुश,
सबको सद्बबुद्वि आ जाए इस वर्ष!
जंग, लड़ाई, हमले
और विध्‍वंस की छाया से भी
दूर रहे दुनिया इस वर्ष,
स्वागत है नववर्ष,
काश कुछ ऐसा हो इस वर्ष!

अब कोई
ऐसी भी मिसाइल बनाएं हम,
ज़माने की भुखमरी
और ग़रीबी मिटाएं हम,
किसी लिफाफे से न निकले
सार्स और एन्थे्रैक्स,
बेकारों को काम का
पैगाम लाए यह वर्ष,
अंधें को मिले ज्योति,
बेसहारों को सहारा,
हर ज़ख़्म को मिले
मरहम इस वर्ष,
स्वागत है नववर्ष,
काश कुछ ऐसा हो इस वर्ष!

करें हर नफरत को बेरंग,
जमे होली का ऐसा रंग,
कोई न रात हो काली,
खिले चहुं ओर हरियाली,
जले बस दीप खुशियों के,
मने ऐसी भी दीवाली,
गाएं गीत क्रिसमस के,
गले मिल ईद मन जाए,
धरा पर उतरा रहे बसंत,
हर्ष में डूबा हो यह वर्ष,
स्वागत है नववर्ष,
काश कुछ ऐसा हो इस वर्ष!

सबके चेहरे

यहां से वहां तक शोर ही शोर है
सबके कपड़े उजले
किन्तु चेहरे दाग़दार हैं
जनता के मन में संदेह की डोर है।

सवालो का गहरा सिलसिला है इन कविताओं में

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जो कविताएँ लिखी गयी थीं वे गांधीवादी, प्रगतिवादी मूल्यों से अनुप्राणित थीं। कवियों के प्रस्पफुटन में संघर्ष की एक जुझारू उमंग थी, आंदोलनों की तरंग थी। आज़ादी के बाद माहौल बुरी तरह बदला। कविता की एक धरा में व्यक्तिवादी कुंठाओं का बोलबाला हुआ, तो दूसरी तरह की स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जो कविताएँ लिखी गयी थीं वे गांधीवादी, प्रगतिवादी मूल्यों से अनुप्राणित थीं। कवियों के प्रस्पफुटन में संघर्ष की एक जुझारू उमंग थी, आंदोलनों की तरंग थी। आज़ादी के बाद माहौल बुरी तरह बदला। कविता की एक धरा में व्यक्तिवादी कुंठाओं का बोलबाला हुआ, तो दूसरी तरह की कविताओं में श्रोताओं की तालियां और उससे जुड़े व्यवसाय की ललक। मंच से जुड़ा कवि शिल्प-विल्प के झमेले में नहीं पड़ा । वह तो गांव-गांव कस्बे-कस्बे जाता रहा, अपनी कविताएँ साहित्य की औसत समझ रखने वाले जनसमुदाय को सुनाता रहा। इस तरह हिंदी में मंच की कविता और गैर-मंचीय कविता एक-दूसरे के प्रति अपनी पहचान खो बैठीं।



मंच की कविता चूँकि मूलत: सुनाने के लिए लिखी जाती है, इसलिए वह जब छप कर आती है, तो उसमे कई चीज़ें साफ़ हो जाती हैं। मंच पर अपना मामला टंच जमाने के लिए कवि एक काव्य-प्रपंच रचता है। अपनी प्रस्तुति का नाटकीय और रणनीतिक इस्तेमाल करता है। कविता जमाने से पहले शब्द-जाल बिछाता है। तरह-तरह से श्रोता को फँसाता है। ये सब छपी हुई कविता में संभव नहीं होता। छपी हुई कविता में जो भी होता है, जैसा भी होता है, शब्दों में होता है। इसलिए अक्सर देखा गया है कि मंच पर पढ़ी जाने वाली कविता छप कर आने के बाद वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाती। इस मामले में कुछ अपवाद कवि हैं जिन्हें पढ़ना भी मोहक लगता है। पवन जैन उनमें से एक हैं।



पवन जैन की छोटी कविताओं में बड़ी-बड़ी चिंताएं हैं और बड़ी कविताओं में समाज के छोटे-छोटे वे दृश्य हैं जो आम जन को रोजाना दिखते हैं। कवि की चिंता है कि ) ऋषियों-मुनियों का यह देश क्यों राम भरोसे चल रहा है। किससे कहा जाए कि इसे कौन निगल रहा है। कवि इस बात को जानता है कि देश को कौन-सी शक्तियां निगल रही हैं पर एक छोटा-सा सवाल कितनी बड़ी चिंता में बदल जाता है कि इस तथ्य को बताया जाए तो किसे बताया जाए। लोकतंत्रा का रहस्यवाद यथार्थ से विमुख है। देश के नागरिक, जिनमें पटवारी भी हैं, तहसीलदार भी और एक कोई शख्स है जो फटी कमीज़ और मैली धेती पहने है। उससे अगर कहा जाए तो क्या वो समझ पाएगा और कचहरी के आसपास जिन लोगों के कपड़े इतने चमकीले-भड़कीले हैं उनसे कैसे कहा जाए, क्योंकि वे तो पता नहीं किस देश के हैं। छोटी कविताओं के ये बड़े सवाल दिमाग़ को झकझोरते हैं और दिल में कथनी की मथनी चला देते हैं।



यहाँ कुछ किवताएँ कथात्मक सूत्र में पिरोई हुई हैं और कुछ हैं जिनमें अत्याचार, शोषण और विसंगतियों की विभिन्न चित्रावलियां समोई हुई हैं। लोकतंत्र की अंधेरी गलियों में आम आदमी क्यों सिफ़‍र् ठोकरें खा रहा है और ताक़तवरों का दरबार पूरी शान से जगमगा रहा है। आखिर इस लोकतंत्र का भविष्य क्या है? ये कविताएँ ऐसे सवाल बाकायदा उठाती हैं।



संग्रह की लंबी कविताओं में जहाँ एक ओर नेताओं, खिलाडि़यों, व्यवसायियों और शासन-प्रशासन के कर्मियों पर तीखे व्यंग्य हैं वहीं दूसरी ओर बहुनिन्दित पुलिस का एक सकारात्मक चेहरा भी है, जिसे लगातार अनदेखा किया जाता रहा है। कुछ कविताओं में फैंटेसी है जैसे – अदालत में अचानक गांधी का आ जाना और गांधीवाद की प्रासंगिकता पर एक अदृश्य बहस का छिड़ जाना।



कुल मिलाकर ये कविताएँ उजले कपड़े वालों के दाग़दार चेहरों को हमारे सामने लाती हैं। इन कविताओं का शैल्पिक ढाँचा सरल है लेकिन इनमें मौजूद सवाल जटिल हैं। ये सवाल इंसानियत की मूलभूत समस्याओं से जुड़े हैं। आप इन कविताओं से जुड़ेंगे तो निश्चय ही आपके नागिरक-मन के उस संकोच को दूर करने के सोच का एक सिलसिला शुरू हो सकता है जो आपसे ही सवाल करे कि हुजूर! आप भूमिकाहीन क्यों हैं? ईमानदार भावलोक में रची गईं ये कविताएं सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में एक सकारात्मक भूमिका का निर्वाह करेंगी। – अशोक चक्रध्रर

चौथा पाया

टीवी कम्प्यूटर की बहुत तेज
रफतार है
पूंजीपतियों की तिजोरी में क़ैद
समाचार है
बाज़ार का सच और सच ही
बाज़ार है
अख़बार अब विज्ञापन है
विज्ञापन ही
अख़बार है।

संस्कृति

नगर के प्रवेश-द्वार पर
एक होटल है
पंच सितारा
जहाँ थिरक रही हैं
विश्व सुन्दरियाँ
विश्व शोहदों के साथ
कहते हैं सब
संस्कृति हो रही है!!

बे-काल

सबके चेहरे पीले
फिर हो उठे गुस्से से लाल
सब चिंतित बेहाल
गाँधी आ धमके बे-काल!

राम भरोसे

ऋषि-मुनियों का यह देश
राम भरोसे चल रहा है।
किससे कहूँ
इसे कौन निगल रहा है?

पहेली

खेत
ग़रीब किसान का है
ट्रैक्टर साहूकार का
फसल किसकी होगी
कौन बताएगा?

अंतिम इच्छा

जब मैंने आतंकवादियों की गोलियों से मारे गए वीर सिपाही के शरीर के पास से उसकी डायरी को उठाया, तो उसके संस्मरणों में मैंने उसकी ‘अंतिम इच्छा’ को इस तरह लिखा हुआ पाया- मेरी लंबी सेवा में पुलिस थाने के अलावा ऐसा कोई सरकारी कार्यालय नज़र नहीं आया, जहां मैंने पूरे साल, चौबीस घंटे कभी ताला लटका नहीं पाया, मेरी जिंदगी में कभी छुट्टी का संडे या मंडे नहीं आया।

जब चारों तरफ जगमगाई दीपों की लाली, तो मैंने भी मना ली दीवाली जब रंग गुलाल उड़ाती निकली मस्तानों की टोली, तो मेरी भी मन गई होली।

टूट न जाएं ताले कहीं, पडे़ न खलल चैन में, मैंने बेचैन आंखों में नींद डूबो ली, धूप, सर्दी और बारिश भी न कर पाए मेरे जोश को ठण्डा, मैं तो करता रहा ड्यूटी लेके हाथ में डंडा।

सच कहूं ख़्याल तो मेरे मन भी बहुत आए, घर जाकर बीवी से बतियाऊँ, पिक्चर ले जाऊँ, मेला घुमाँ, बच्चों को पढ़ाऊँ, थपकी दे सुलाऊँ, पर कमबख़्त ड्यूटी ने हमेशा आ़फत डाली, कभी मन मसोस डाला, कभी कल पे बात टाली ज़माने ने भी देखा तो हिकारत से देखा, ग़लती पे खाई अफसर की डाँटें, जिसके दामन में हों सिप़र्फ नफरत और काँटे, तुम्हीं बताओ वो फूल कहाँ से बाँटे माना मेरी वर्दी में नज़र आते हैं काले धब्‍बे, पर अब तो इल्जाम है, नींव की ईंट से शिखर तक, हर कोई बेताब है नहाने को भ्रष्टाचार की गंगा पैर से सर तक जब पुत रही हो हर चेहरे पर कालिख, तो मैं ही उजला नज़र कैसे आँऊ ! जिस समाज में दुर्लभ हो गया है ईमान का साबुन, वहॉ में अपनी वर्दी कैसे चमकाऊँ हम बाँग्लादेश मुक्ति और कारगिल गाथा बड़े गर्व से गाते हैं, वीर शहीदों के कि़स्से हम सुनते और सुनाते जितने फौजी एक युग में अपना शीश कटाते हैं, उतने तो यहां हर साल ड्यूटी पर मारे जाते हैं।

आतंकी ओर लुटेरों से यह चमन नहीं लुट पाएगा, खाकी वर्दी वालों का बलिदान व्यर्थ न जाएगा लेकिन जब इतिहास लिखो तुम, क़लम उठाओ पन्नों पर, कसम तुम्हें है। सच्चाई की इतना बस दिखला देना, जिक्र करो जब हरियाली और ख़ुशहाली पंजाब की, पुलिस जनों की विधवाओं की सूनी मांग दिखा देना।

कश्मीर में लोकतंत्र का झंडा जब फहराता हो, कुछ अनाथ बच्चों की बस हँसती तस्वीर दिखा देना, आसाम मणीपुर और त्रिपुरा में अब विघटन का शोर नहीं, कुछ गुमनाम चिताओं पर तुम श्रद्वा सुमन चढ़ा देना, गर दिखती हो शांति और व्यवस्था की उजली तस्वीर कहीं, डाकू की गोली से घायल लँगड़ी टाँग बता देना।

सीमा पर लड़ता है फौजी अपने दुश्मन से, हम लड़ते अपनों से अपने मन से, होती है हमसे भी ग़लती, ग़लती करता है इँसान, हमको तो करनी है केवल कातिल, वहशी की पहचान।

कहते हैं कुछ लोग कि हम हैं वर्दीवाले गुण्डे, अपनी भाषा गाली-डंडे, बदजुबान हैं, बददिमाग़ हैं, भ्रष्ट और निकम्मे हैं, सच्चाई गर इसमें हो तो तोहमत हमें लगा देना, पर मेरी ‘अंतिम इच्छा’ पर इतना सम्मान दिखा देना, गर खाकी वर्दी के पीछे भी दिख जाए इंसान कोई, तो बस प्यार से मुस्करा देना।

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