नव आरक्षक सम्मेलन

आज से एक वर्ष पूर्व आपने मध्यप्रदेश पुलिस की वर्दी पहनी थी और अब आप अपना प्रशिक्षण पूर्ण करके प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की सुरक्षा के लिये पूरी मुस्तैदी से कार्य प्रारंभ करने जा रहे हैं । महाभारत में एक प्रसंग हैं कि ’’धर्मराज युधिष्ठर से यक्ष में एक सवाल किया था कि दुनिया में सबसे बड़ा दान कौन सा है, तो पाण्डव पुत्र युधिष्ठर ने जवाब दिया था कि दुनिया में सबसे बड़ा दान अभय दान है, अभय दान यानी सुरक्षा का दान’’ अतीत में यह जिम्मा राजा और सेनापति का था, कालान्तर में यह जिम्मेदारी कोतवाल की हुई और वर्तमान में यह जिम्मेदारी पुलिस की है । एक यजुर्वेद की सूक्ती भी है कि ’’ प्रहरी को शायद ही किसी ने तब सोते हुए देखा हो, जब दूसरे उसके भरोसे सोते थे ।’’



आजादी के 66 साल के बाद पुलिस का चाल, चेहरा और चरित्र बदला है, पुलिस की प्राथमिकताओं और जिम्मेदारियों में निरन्तर बदलाव आये हैं । अब पुलिस का दायित्व केवल अपराधों की रोक-थाम, अपराधियों की धर-पकड़, विवेचना और कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं है। आतंकवाद हो या नक्सलवाद, समस्या चाहे सड़क दुर्घटना की हो या यातायात प्रबंधन की, अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा का मसला हो या साम्प्रदायिक तनाव पर नियंत्रण का , आर्थिक अपराधों की नई फसल हो या सायबर क्राइम की भू-मण्डलीय दुनिया, हर दिन पुलिस के सामने नित नई चुनौतियाँ खड़ी होती हैं और उस पर भी कष्ट इस बात का, कि पुलिस की नौकरी में न तो ड्यूटी के घण्टे तय हैं और न ही छुट्टी का दिन, पूरे साल 365 दिन 24 घण्टे एक सरकारी कार्यालय होता है, जिसके नसीब में कभी ताला नहीं होता और वह है पुलिस थाना । आपकी चुनौतियाँ चाहे कितनी ही मुश्किल हों, पर आपका कार्य बहुत पुनीत है । आपको फक्र होना चाहिये कि आप प्रदेश, समाज और जनता की हिफाजत के लिये अपने आपको समर्पित करने जा रहे हैं । मेरा यह दृढ़ मत है कि बिना सुरक्षा के विकास सम्भव नहीं हैं और यह आपके साथियों की लगन और मेहनत का ही परिणाम है कि मध्यप्रदेश भारत में शांति के टापू के रूप में जाना जाता रहा है । यह मध्यप्रदेश की सुरक्षा और स्वच्छ वातावरण का ही परिणाम है कि यहाँ औध्योगिकीकरण की प्रक्रिया गतिशील हो गई हैं, निरन्तर औध्योगिक विकास बढ़ रहे हैं और हर रोज प्रदेश में विकास की नई इबारत लिखी जा रही है ।

आबादी के अनुपात में पुलिस बल चाहे जितना भी कम हो, लेकिन आज भी आम आदमी को पुलिसकर्मी को देखकर अपनी सुरक्षा के प्रति यकीन और सुकुन होता है । आपका यह दायित्व है कि पुलिस में आम आदमी का यह विश्वास कायम रहे । वर्दी वही सम्मान के काबिल हैं, जिसको देखकर शरीफ चैन महसूस करें और बदमाश बैचेन रहे । जब भी मैं प्रदेश के दौरे पर जाता हॅूं तो जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और आम नागरिक यह माँग करते हैं कि नये पुलिस थाने और चैकियाँ खुलनी चाहिये । यह इस बात का प्रतीक है कि आम जनता द्वारा पुलिस की जरूरत महसूस की जा रही है, जब कभी भी कहीं घटना, दुर्घटना होती हैं तो आज भी लोग पुलिस थाने की ओर दौड़ लगाते हैं । जनता का पुलिस पर यह विश्वास कायम रहे, ओर बढ़े, यही मेरी आकांक्षा हैं । एक कहावत है कि ’’ताकतवर मौके पर जीत जाता है और धनवान कचहरी में’’ जो व्यक्ति लुटता है या पीटता है, वही मजबूरी में थाने की सीढि़याँ चढ़ता है । यह हम सबका और विशेषकर आपका दायित्व है कि जो भी व्यक्ति थाने में अपनी बात कहने आये, उसकी बात तल्लीनता से सुननी चाहिये या जिसके साथ जुल्म हुआ है, उसकी रिपोर्ट लिखकर त्वरित कार्यवाही होनी चाहिये । पुलिस थाना न्याय का पहला मंदिर है, जो भी विपत्ति, मुसीबत और मजबूरी में थाने की सीढि़यों पर चढ़े, मेरी तमन्ना यही है कि वह न्याय के पहले मंदिर से निराश नहीं लौटे ।



एन.आई.सी. हेतु माननीय मुख्यमंत्री महोदय के अभिभाषण के मुख्य बिन्दु



मध्यप्रदेश शासन द्वारा विगत 9 वर्षों में पुलिस विभाग के साधन एवं संसाधनों में वृद्धि के सार्थक प्रयास किये गये हें । हमारी सरकार की स्थापना के 9 वर्षों के बाद 32280 पदों की वृद्धि की गई है । वर्ष 2004 से अब तक कुल 97 नवीन थाने तथा 111 नवीन पुलिस चैकियाँ स्थापित की गई हैं ।

अत्याधुनिक क्षमता एवं आधुनिक साधन तथा संसाधन मुहैया करने हेतु मध्यप्रदेश शासन द्वारा गैर योजना व्यय के अतिरिक्त योजना व्यय में भी पुलिस विभाग को शामिल किया गया है । इसी तारतम्य में पिछले वर्ष 12 नवीन योजनाएं एवं इस वर्ष 16 नवीन योजनाओं सहित कुल 28 योजनाओं के लिये 300 करोड़ से अधिक की राशि शासन द्वारा प्रदाय की गई है ।

वर्तमान परिवेश में आने वाली चुनोतियों का सामना करने के लिये पुलिस प्रशिक्षण का उन्नयन एवं आधुनिकीकरण किया जा रहा है । भौंरी में सर्वसुविधा सम्पन्न नवीन प्रशिक्षण केन्द्र हाल ही में लोकार्पित किया गया है तथा पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय इन्दौर को आधुनिक सुविधाओं सहित विस्तारित किया गया है । सागर में नया पुलिस प्रशिक्षण स्कूल खोला गया है तथा विशेष सशस्त्र बल के प्रशिक्षण में विस्तार किया जा रहा है ।

पुलिस बल में साधन-संसाधन की ही वृद्धि नहीं हुई है बल्कि आरक्षक से निरीक्षक स्तर तक के अधिकारियों के लिये सर्वसुविधायुक्त आवास हेतु मध्यप्रदेश शासन ने 10,500 आवासों के निर्माण की स्वीकृति दी है। इन आवासों में से 2500 आवासों का निर्माण पूर्ण हो चुका है एवं 8000 आवासों का निर्माण जारी है ।



माननीय मुख्यमंत्री जी के उद्बोधन हेतु मुख्य बिन्दु



आज आप सब के जीवन का बहुमूल्य क्षण है, जब आप मध्यप्रदेश पुलिस की गौरवशाली विरासत और परम्पराओं का एक हिस्सा बनने जा रहे है। यह इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि आप इस एकीकृत पुलिस प्रशिक्षण संस्थान भौंरी से प्रशिक्षण लेने वाले पहले बैच के प्रशिक्षणार्थी का दर्जा भी प्राप्त करेंगे। आजादी के 66 साल के बाद पुलिस का चाल, चरित्र और चेहरा बदला है, नये दौर में पुलिस की प्राथमिकताओं और जिम्मेदारियों में गुणात्मक बदलाव आया है। बात चाहे आतंकवाद की हो या नक्सलवाद की, आर्थिक अपराधों की नई फसल या सायबर क्राइम के भूमण्डलीय विस्तार की, आगामी दिनों में भी पुलिस को नित नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और इस चुनौती से निपटने के लिये पुलिस के प्रशिक्षण को आधुनिकतम तकनीकी और संसाधनों से सुसज्जित करना आवश्यक है और भौंरी का यह नवीन प्रशिक्षण संस्थान, उस दिशा में पहला पड़ाव है ।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि पुलिस उपनिरीक्षक यानी थाना प्रभारी, पुलिस नेतृत्व की पहली सीढ़ी है । पुलिस का नाम सुनते ही आम आदमी के दिमाग में थाने और थानेदार की तस्वीर अवतरित होने लगती है। यदि पुलिस थाना हमारी आतंरिक सुरक्षा की सबसे मजबूत कड़ी है, तो थाना प्रभारी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है । फिल्मों से लेकर किस्से, कहानियों और लोक जीवन में थाना प्रभारियों की कभी दबंगई और सिंघम होने के चर्चें होते हैं तो कहीं-कहीं लेट लतीफी और संवेदनहीनता की गूँज भी सुनाई देती है । बात नायक या खलनायक बनने की नहीं हैं बल्कि इस बात की है कि जनता हमें अपना मित्र समझे ना कि शत्रु ।

आबादी के अनुपात में पुलिस बल चाहे जितना भी कम हो, लेकिन आज भी आम आदमी को पुलिसकर्मी को देखकर अपनी सुरक्षा के प्रति यकीन और सुकुन होता है । आपका यह दायित्व है कि पुलिस में आम आदमी का यह विश्वास कायम रहे । वर्दी वही सम्मान के काबिल हैं, जिसको देखकर शरीफ चैन महसूस करें और बदमाश बैचेन रहे । जब भी मैं प्रदेश के दौरे पर जाता हॅूं तो जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और आम नागरिक यह माँग करते हैं कि नये पुलिस थाने और चैकियाँ खुलनी चाहिये । यह इस बात का प्रतीक है कि आम जनता द्वारा पुलिस की जरूरत महसूस की जा रही है, जब कभी भी कहीं घटना, दुर्घटना होती हैं तो आज भी लोग पुलिस थाने की ओर दौड़ लगाते हैं । जनता का पुलिस पर यह विश्वास कायम रहे, ओर बढ़े, यही मेरी आकांक्षा हैं । एक कहावत है कि ’’ताकतवर मौके पर जीत जाता है और धनवान कचहरी में’’ जो व्यक्ति लुटता है या पीटता है, वही मजबूरी में थाने की सीढि़याँ चढ़ता है ।

यह हम सबका और विशेषकर आपका दायित्व है कि जो भी व्यक्ति थाने में अपनी बात कहने आये, उसकी बात तल्लीनता से सुननी चाहिये या जिसके साथ जुल्म हुआ है, उसकी रिपोर्ट लिखकर त्वरित कार्यवाही होनी चाहिये । पुलिस थाना न्याय का पहला मंदिर है, जो भी विपत्ति, मुसीबत और मजबूरी में थाने की सीढि़यों पर चढ़े, मेरी तमन्ना यही है कि वह न्याय के पहले मंदिर से निराश नहीं लौटे ।

सामुदायिक पुलिस की चर्चायें मध्यप्रदेश और पूरे देश में होती हैं। जनता और पुलिस के बीच में सेतु और समन्वय का काम भी पुलिस के लिये अत्यन्त आवश्यक है और थाना प्रभारी जनविश्वास को अर्जित करने में सबसे अधिक मददगार हो सकते हैं । जिन लोगों ने भी शोले फिल्म देखी होगी, उन्हें याद होगा कि किस तरह एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी अपने दोनों हाथ कट जाने के बावजूद समाज के दो दिग्भ्रमित नौजवानों वीरू एवं जय को मुख्य धारा में जोड़कर उन्हें कुख्यात दस्युओं से लड़ने के लिये पे्ररित करता है और जनता के सहयोग से अपने लक्ष्य में सफल होता है ।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मध्यप्रदेश पुलिस की तत्परता, सजगता और संवेदनशीलता से दस्यु समस्या पर विराम लगा है, आतंकी नेटवर्क को मध्यप्रदेश में पनपने नहीं दिया है और नक्सली गतिविधियों के प्रभाव पर भी अंकुश लगा है । मध्यप्रदेश की सुरक्षा और स्वस्थ वातावरण का ही परिणाम है कि हमें विकास की नई इबारत लिखने में सहायता मिल रही है । सुरक्षा के बिना कोई विकास संभव नहीं है, हमारा ध्येय भी यही है कि पुलिस सुरक्षा के लिये, सुरक्षा प्रगति के लिये है।

आज जिस प्रशिक्षण संस्थान की आधारशिला रखी गई है वह मध्यप्रदेश पुलिस की इमारत और बुलन्द बनाने के लिये नींव की ईंट और आधार स्तम्भ का काम करेगी । मैंने अभी प्रशिक्षण संस्थान का भ्रमण भी किया और यह पाया कि यह कोशिश की गई है कि प्रशिक्षण के जो भी आधुनिकतम उपकरण, साधन, संसाधन और तकनीकी है, उनका समुचित उपयोग किया जाये । वैज्ञानिक अन्वेषण और नई सेाच के साथ ट्रेनिंग दी जाये, ताकि वर्तमान और भविष्य की हर चुनौती के लिये हम सजग प्रहरी तैयार कर सकें ।

भारत की संसद पर आतंकवादियों के आक्रमण के बाद से ही देश में आन्तरिक सुरक्षा के क्षेत्र में आधुनिक तकनीक के उपयोग की आवश्यकता महसूस की जा रही है । आतंकी कार्यवाही रोकथाम के लिये आधुनिक तकनीकों में नगरों एवं महत्वपूर्ण स्थानों पर सीसीटीवी आधारित निगरानी एवं सुरक्षा व्यवस्था का अह्म स्थान है । इस आवश्यकता को भारत सरकार द्वारा गछित ’’राष्ट्रीय पुलिस मिशन’’ के अंतर्गत किये जा रहे अध्ययनों में स्वीकार किया गया है । नवम्बर -2008 में मुम्बई में हुए आतंकी हमले में रेल्वे स्टेशन पर फायरिंग करते हुए आतंकी कसाब की सीसीटीवी फुटेज उसके विरूद्ध निर्विवाद साक्ष्य प्रस्तुत होने से उसे फाँसी की सजा संभव हो सकी। इसी प्रकार आतंकवादी यासीन भट्कल एवं अन्य की पुणे स्थित जर्मन बेकरी ब्लास्ट एवं हैदराबाद में दिलसुख नगर में हुए विस्फोटों में आरोपियों की सीसीटीवी फुटेज से ही पहचान हो सकी है । दिल्ली में इसराइली दूतावास के वाहन पर ईरानी आतंकवादी हमले की सीसीटीवी फुटेज से इस घटना के सही मुल्जि़मों की पहचान हो सकी है ।

मध्यप्रदेश में भी सिमी नामक आतंकी संगठन एवं नक्सलियों की उपस्थिति सर्वज्ञात है । देश के मध्य में स्थित होने से यहाँआतंकियों की आमद रफ्त होने के हमेशा ही प्रभाव मिलते रहे हैं । अतः आवश्यक है कि समय रहते मध्यप्रदेश में आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जावे । इस केन्दीय उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पुलिस मुख्यालय द्वारा सीसीटीवी आधारित निगरानी व्यवस्था की रूपये 429.24 करोड़ तथा यातायात व्यवस्था शीर्ष में रूपये 190 करोड़ की डीपीआर प्रस्तुत की गई है । उक्त योजनाओं में महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थायी सीसीटीवी लगाना, मोबाईल सीसीटीवी वाहन, यूएव्ही के माध्यम से निगरानी, महत्वपूर्ण स्थानों की 3-डी रूपांकन रखने, इलेक्ट्रानिक डिस्प्ले बोर्ड, इस हेतु पुलिस कंट्रोल रूम भवनों, यातायात कंट्रोल रूम भवनों का निर्माण/ आवश्यक सुधार, पुलिस संचार व्यवस्था में सुधार, ड़ाटा सेन्टर बनाना, प्रशिक्षण देना, मरम्मत आदि कम्पोनेन्ट शामिल हैं

उक्त डीपीआर पर परियोजना परीक्षण समिति की बैठक दि. 30.8.2013 को हो चुकी है । उक्त परियोजनाओं को अब मंत्रिमण्डल की स्वीकृति की आवश्यकता है । योजना अवधि 2013-17 के उक्त राशियाँ आवंटित करने के लिये राज्य योजना आयोग सहमत है तथा वर्ष 2013-14 के लिये योजना मद में क्रमशः रूपये 22 करोड़ं एवं रूपये 25 करोड़ का प्रावधान भी हो गया है । इसके अलावा भारतीय योजना आयोग से भी रूपये 25 करोड़ की एक मुश्त केन्द्रीय सहायता (एडीशनल सेन्ट्रल असिस्टेन्स) प्राप्त हो चुकी है । वर्ष 2013-14 के बजट में भी क्रमशः रूपये 7 करोड़ एवं रूपये 10 करोड़ का आवंटन दिया गया है । शेष राशियों की मांग द्वितीय अनुपूरक में की जावेगी।

वित्त विभाग योजनाओं के महत्व तथा आवश्यकता से सहमत है, किंतु अगले चरणों में वित्तीय उपलब्धता कराने को लेकर उसे कतिपय आपत्तियाँ हैं। अतः मंत्रिमण्डलीय स्वीकृति में वित्तीय आपत्ति को निरस्त करने की आवश्यकता हो सकती है ।

चंबल महोत्सव की सार्थकता : बीहड़ों में बहे बदलाव की बयार

हाल ही में मुरैना में आयोजित हुए दो सप्ताह के चंबल महोत्सव में बदलाव की नई बयार दिखाई दी। कभी बागी, बीहड़, और बंदूक के लिए पहचाने जाने वाली चंबल घाटी में कला, साहित्य और परंपराओं के उत्सवों का आयोजन इन संभावनाओं का आगाज है कि यहां नई पीढ़ी सुर और संगीत की महफिलों में रम रही है।
सदियों से पूरे देश में चंबल की पहचान दस्युओं की पदचाप एवं गरजती गोलियों से गूंजती घाटी की रही है। बात चाहे फिल्मों की हो या कहानी किस्सों की ”मुझे जीने दो से लेकर ”पानसिंह तोमर तक और ”पुतली बाई से लेकर ”बैंडिट क्वीन तक डकैतों के महिमा मंडन की कथाएं इस अंचल में बड़े चाव से कही और सुनी जाती हैं। हर फिल्म देखने के बाद दर्शकों को भी लगता है कि वो भी बंदूक उठाएं और बीहड़ों में कूंद जाएं। व्यवस्था से बगावत करने वाले महान धावक पानसिंह तोमर की जीवनी पर बनी फिल्म में जब स्थानीय पत्रकार उनके चरणों में बैठकर उनके साक्षात्कार ले रहे होते हैं तो उनके चेहरे पर ऐसे भाव होते हैं मानो वे साक्षात परमेश्वर का दर्शन कर रहे हैं। दस्युओं का इतना गुणगान केवल फिल्मों और कहानियों में नहीं है, बल्कि जब भी वे अपनी बिरादरी के गांव में जाते थे तो गांव के बुजुर्ग, मुखिया, सरपंच उनका तिलक लगाकर स्वागत करते थे और यह कहते हुए धन्य समझते थे कि मोड़ा तूनें बिरादरी में हमाओ नाम कर दऔ, तीन स्टेट और सत्रह थानों की पुलिस तोए ढूंढ रही है। सरकार ने लाखों का इनाम रखौ है। तूनें हमारी नाक ऊंची कर दई। जहां डाकूओं का इतना गुणगान और सम्मान हो वहां बड़े दस्यु गिरोहों का न पैदा होना ही सवाल खड़े करता है।
चंबल में डकैतों की अब नई फसल पैदा न होने के मुझे तीन कारण नजर आते हैं। पहला तो आचार्य विनोबा भावे, लोकनायक जयप्रकाश और गांधीवादी सुुब्बाराव के प्रयासों से बड़े दस्यु गिरोहों के आत्मसमर्पण ने पूरी चंबल घाटी में हृदय परिवर्तन की नई इबारत लिखी। आज भी सैकड़ों दस्यु सरेंडर के बाद शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। दूसरा प्रमुख कारण यह है कि चंबल नदी से निकली नहरों ने पूरे मुरैना और भिंंड के गांव में इस रेतीले बीहड़ों को उपजाऊ जमीन में बदल दिया है। अब वहां बागियों की जगह सरसों की फसल लहलहा रही है। चंबल की इस पीली क्रांति ने नई पीढ़ी को भी बंदूक की जगह कलम उठाने की राह दिखाई है। मुरैना और भिंड में खुल रहे नए स्कूल और कालेजों में शिक्षा के विस्तार की नई कथा लिखी जा रही है। तीसरा और सबसे प्रमुख कारण यह है कि अब डकैती फायदे का सौदा नहीं रही। बड़े गैंग अब रहे नहीं, छोटा गैंग बनाने में भी सालों लग जाती हैं और उसके ऊपर हर गांव में पचास से सौ तक लाइसेंसी हथियार हैं। गैर लायसेंसी हथियार कितने हैं ये आंकड़ा न तो प्रशासन और पुलिस के पास है और न ही खोजी पत्रकारों और सिकलीगरों के पास। गांव में आत्मरक्षा के प्रबंध होने से डकैतों को डकैती डालने में खुद के लुटने-पिटने का खतरा भी है। इसलिए अब चंबल में डकैती कम और अपहरण ज्यादा होते हैं। पकड़ करना ज्यादा सेफ है। पहले तो अपहरण की रिपोर्ट ही नहीं होती और यदि हो भी तो गवाह सबूत की कमजोरी में केस टिक ही नहीं पाता। अपहरण फायदे का सौदा हो सकता था लेकिन चंबल वाले यहां चूक गए। अपहरण और पकड़ का पेटेंट ही नहीं करवाया। इसलिए यह धंधा पहुंच गया यूपी और बिहार में। अब तो ठेठ दिल्ली, मुंबई, जयपुर और हैदराबाद में अपहरण के नाम पर फिरौती वसूली जा रही है। ऊपर से बागी कहलाने में जो इज्जत मिलती थी वो गली-चौराहों में खुल गई कलारियों ने मिट्टी में मिला दी। शाम को एक ढक्कन पीने के बाद यहां सैकड़ों लोग अपने को बागी कहने लगते हैं। जिस धंधे में न सम्मान हो न शोहरत और ऊपर से घाटे का सौदा, उस धंधे को तो चौपट होना ही था। चंबल की दस्यु समस्या को खत्म करने में पुलिस और कानून से भी ज्यादा बड़ी भूमिका लोगों के आत्मरक्षा के प्रयासों, चंबल की नहरों और शिक्षा के विस्तारीकरण की भी है।
अब चंबल की नई समस्या दस्यु गिरोहों और अपहरण की नहीं है, बेबात के झगड़ों और मूंछों की लड़ाई की है। तेरी भैंस मेरे खेत में क्यों गई, तेरी बकरिया मेरा चारा क्यों खा गई, तेरी गाय ने मेरे दरवाजे के सामने गोबर क्यों किया जैसी किसी भी बात से शुरू होकर जूतमपैजार, लाठी-डण्डा और गोली चलना आम बात है। फिर घायल और मरने वालों की चिंता छोड़कर एफआईआर कराने के लिए घंटों माथापच्ची इस बात पर होती है कि आरोपी पक्ष के कौन से रिश्तेदार, नातेदार और शुभचिंतकों के नाम रिपोर्ट में लिखवाने हैं। विरोधी पक्ष के जो भी लोग या तो सरकारी नौकरियों में हैं या अच्छा व्यवसाय कर रहे हैं, उनका नाम तो उर्फयित और वल्दियत के साथ लिखवाते ही हैं, ताकि पुलिस किसी को संदेह का लाभ न दे सके। मरने वाले को भी तभी फूंकते हैं जब एफआईआर की नकल हाथ में हो और चेहरे पर संतोष कि- ‘हमारा तो एक मरा हमने तो साले के पूरे खानदान को निपटा दिया, अब लगा बेटा थाने और कचहरी के चक्करÓ। बदले की इस आग में कितनी पीढिय़ां तबाह हो रही हैं, इस पीड़ा को चंबल की धरती से ज्यादा और कौन समझ सकता है?
पूरे भारत में मातृपितृ भक्ति के लिए श्रवणकुमार की
कथाएं सुनाई जाती हैं। चंबल में उलट किवंदती प्रचलित है कि तीर्थाटन कराने जब श्रवण कुमार अपने बुजुर्ग माता-पिता को चंबल किनारे लाए तो चंबल का पानी पीते ही उन्हें कॉवड़ से उतारकर कहने लगे कि अब मेरे से और सेवा नहीं होती मैं तो चला। स्थानीय नाविकों ने बूढ़े मां-बाप को समझाया कि कुछ नहीं पानी का असर है थोड़ी देर में आपका बेटा माफी मांगकर फिर से आपको तीर्थ यात्रा पर ले जाएगा। श्रवण कुमार ने तो माफी मांग ली और अपने मां-बाप की ताउम्र सेवा की। चंबल में नई पीढ़ी में यहां के पानी का असर ठेठ देहात तक दिखाई पड़ता है जहां नौजवान बेटे अपने बुजुर्ग डोकरा और डुुकरिया को दिखाकर पड़ौसियों और विरोधियों को धमकाते रहते हैं कि होश में रहना नहीं तो डोकरा को टपकाकर उन्हें हत्या के मामले में फंसा देंगे। घर में 302 आईपीसी की एफआईआर तैयार रखी है। हद तो यह है कि बुजुर्गवार भी अपने नाती-पोतों की बातों पर डांट फटकार नहीं करते उल्टे मुस्कराते हुए कहते हैं कि लल्लू में संस्कार तो अच्छे आए हैं। पुस्तैनी रंजिश में नई पीढ़ी को ढकेलने से सिर्फ वकीलों और दलालों की पौ-बारह हो रही है।
संपूर्ण चंबल अंचल की सबसे बड़ी बदनामी और भयावह समस्या है, महिला-पुरुष अनुपात का निरंतर कम होना। मध्यप्रदेश में मुरैना और भिंड के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पूरे प्रदेश में सबसे तेजी से महिला और पुरुषों का अनुपात इसी क्षेत्र में गिर रहा है। पहले कोई इक्का-दुक्का महिलाओं को लेकर ये कानाफूसी होती थी कि इस अम्मा ने न जाने कितनी मौडिय़ां पैदा होते ही खाट के पाए के नीचे दबाकर मार दई। ऐसे भी किस्से हैं कि नवजात बालिकाओं को गले में तम्बांकू भरकर या फिर जहरीला पदार्थ खिलाकर उनके ही परिवार वालों ने मार डाला। आज भी चंबल के बीहड़ों की एक बिडंबना यह है कि लड़का और लड़की के बीच हर चीज में फर्क किया जाता है उनके लालन पालन से लेकर इलाज में इतनी कोताही बरती जाती है कि लड़कियां कभी कुपोषण से तो कभी इलाज के अभाव में काल कलवित हो जाती हैं। विज्ञान के इस युग में तो तमाम नीम-हकीम, झोलाछाप और मुन्नाभाई एमबीबीएस आ गए हैं जो अल्ट्रासाउंड के नाम पर कन्या भू्रण हत्या के कारोबार में लगे हैं। कुल मिलाकर लड़कियों का जीना ही मुश्किल कर दिया है। नतीजा सामने है पहले तो चंबल के भय के कारण बाहर से सगाई वाले आने में हिचकिचाते हैं और जब पूरे अंचल में लड़कियां ही कम होंगी तो यहां के लड़कों के कुंवारे रहने का खतरा बढ़ जाएगा। यहां तो घर के बड़े-बुजुर्गों द्वारा ही बेटियों को पैदा होने से पहले और जन्म के बाद मारने के कृत्यों से उनके ही वंश का नामोनिशान मिटने का खतरा पैदा हो गया है। अगर हम नहीं सुधरे तो संपूर्ण ग्वालियर चंबल संभाग में कुछ वर्षों बाद कस्बों और गांव में कुंवारों की नई फौज पैदा हो जाएगी।
चंबल महोत्सव का यह आयोजन मात्र धरोहर, परंपरा और विरासत का आयोजन नहीं है वरन यह परिवर्तन की नई कहानी भी कह सकता है। मैं तो परम पिता परमेश्वर से इतनी ही प्रार्थना करना चाहता हूं कि तू कुछ और मत कर बस इतना कर दे कि इस घाटी के नजारे बदल जाएं। चंबल घाटी बागी और बीहड़ों के लिए न जानी जाए बल्कि जानी जाए तो अमर शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की जन्म भूमि के लिए। बिस्मिल जी की कुर्बानी का ही प्रताप है कि आज भी चंबल के लाखों नौजवान सेना, पुलिस और सुरक्षा बलों की सेवाओं में कार्यरत हैं। चाहे भारत-पाक युद्ध हो, कारगिल की लड़ाई हो या सीमा पर तनाव, देश पर मर मिटने वालों में कोई चंबल का सपूत भी होता ही है जो यह कहकर प्राण त्याग देता है कि
‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।
चंबल के बीहड़ों में अब घोड़ों की टाप और बंदूकों की गोलियां सुनाई नहीं देतीं बल्कि यहां के सरसों के पीले फूलों की खुशबू और सरसों के तीखे तेल की महक पूरे देश में फैल रही है। चंबल की घाटी की पहचान रेत खदान माफियाओं और मवैशी चोरों के कारण न हो वरन इस बात से हो कि चंबल नदी में डॉलफिन अठखेलियां करती हैं, मगरमच्छ और घडिय़ाल इसके किनारे पर धूप सेंकते हैं। चकवा-चकवी जैसे हजारों दुर्लभ पक्षी चंबल अभ्यारण की शांति से सम्मोहित होते हैं। मुरैना झूमते-नाचते मोरों के लिए भी जाना जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए चंबल के इन पशु-पक्षियों को निहारने देश-विदेश के सैलानियों का सैलाव चंबल के तट पर उमड़े।
पुरातत्व के रजकण भी चंबल की धरा में व्याप्त हैं। जिस शिल्पकार ने संसद भवन की परिकल्पना की होगी उसने पिढ़ावली और मितावली के मंदिरों को जरूर देखा होगा। बटेश्वरा के विशाल शिव मंदिरों एवं ककनमठ के भग्नाविशेषों में यहां के गौरवशाली अतीत के दर्शन होते हैं। महाभारत कालीन कुंतलपुर के अवशेष भी इस धरती को ऐतिहासिक बनाते हैं। चंबल महोत्सव जैसे आयोजन इस क्षेत्र में बदलाव की इस बयार का सूत्रपात्र कर रहे हैं।

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