ढूंढती है फिर नया विश्‍वास ये आँखें....................

पूज्‍य पिताजी की पावन स्‍मृतियों में बाबूलाल जैन सेवा संस्‍थान के 19 वें नि:शुल्‍क चिकित्‍सा एवं नेत्र तथा दंत ऑपरेशन के शिविर का शुभारंभ पूज्‍य माताश्री श्रीमति कुसुम देवी जैन एवं मुख्‍य अतिथी श्री प्रदीप जैन (पी.एन.सी.), अध्‍यक्ष, अखिल भारतीय जैन सेवा न्‍यास द्वारा जैन धर्मशाला राजाखेड़ा में 27 अक्‍टूबर 2019 को किया गया । मानव सेवा का यह सिलसिला वर्ष 2001 से अनवरत् जारी है और राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश तथा उत्‍तर प्रदेश के 50000 से अधिक मरीजों को प्रत्‍यक्ष रूप से लाभ पहुँचाकर मानवता की सेवा का यह यज्ञ निरंतर जारी है । करवा चौथ के शुभ दिन प्रारंभ हुए इस शिविर में 2400 से अधिक मरीजों का परीक्षण किया गया । 245 चयनित लोगों के ऑपरेशन देश के प्रख्‍यात नेत्र चिकित्‍सक डॉ. पुरेन्‍द्र भसीन के हाथों रत्‍न ज्‍योति नेत्रालय, ग्‍वालियर में किये गये और 350 से अधिक दांतों के ऑपरेशन डॉ. संजय शर्मा के नेतृत्‍व में राजाखेड़ा में ही किये गये।
900 लोगों को केम्‍प में ही चश्‍में बनाकर वितरित किये गये तथा पूरी तरह दंत विहीन हो चुके 37 लोगों की नई बत्‍तीसी भी परमार्थ सेवा न्‍यास, मुरैना के दंत चिकित्‍सकों द्वारा बनाई गई। ''सर्वे भवन्‍तु सुखिन:, सर्वे संतु निरामय:'' के इस पुनीत महायज्ञ में दिल्‍ली के जैन युवा क्‍लब के 100 से अधिक नौजवानों ने शिविर में फल वितरण एवं व्‍यवस्‍था की पूरी जिम्‍मेदारी संभाली तथा 28 अक्‍टूबर की सुबह प्रांगण में स्थित जैन मंदिर में 24 तीर्थकरों का पावन अभिषेक भी किया। परम पिता परमेश्‍वर से प्रार्थना है कि चंबल के इस अंचल में ही नहीं वरन् संपूर्ण विश्‍व में मानवता की ऐसी असंख्‍य लौ निरंतर जलती रहे।
हर शिविर के साथ यही कामना और भावना रहती है कि कल के अखबारों की सुर्खियों का दौर बदल जाये, अखबारों में खबरें न हों आतंकी विस्‍फोट की, किसी प्राकृतिक आपदा की, वरन् खबर हो कि अब हमारे चिकित्‍सकों ने स्‍वास्‍थ्‍य और सेवा के ऐसे मंदिर बनाये हैं, जहाँ पीडि़तों की हर बीमारी का समुचित ईलाज सम्‍भव है । कल के अखबारों में खबरें न हों कातिलों की, दरिदों की, वहशियों की, खबरें हों उनकी, जिन्‍होंने किसी विकलाँग को सबलाँग बनाया हो, किसी डूबते को बचाया हो और किसी अन्‍धे को आँखों की रोशनी दी हो। एक कवि के शब्‍दों में...............

''ढूँढती है फिर नया विश्‍वास ये आँखें,
वेदना पढती कभी परिहास ये आँखें,
जिंदगी को और कुछ करवट बदलने दो,
फिर रचेगी सृष्टि का इतिहास ये आँखें।''

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